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यहां कभी आबाद थी शानदार बस्ती, अब बचे हैं केवल अवशेष। रोचक इतिहास है गिरावड़ी का। फरमाणा में आज भी बस्ते हैं गिरावड़ी वाले।-24c न्यूज पहुंचा चौबीसी के एक खास पुरास्थल पर!- विशेष संडे स्टोरी

वर्तमान फरमाणा और बेडवा के मध्य आबाद थी कभी गिरावड़ी

पांच हजार साल पुराना हो सकता है गिरावड़ी का इतिहास
हमेशा के लिए नष्ट होने की कगार पर है गिरावड़ी खेड़ा
केवल आधा एकड़ में बचे हैं अवशेष
राजस्थान तथा भिवानी के गांव बागन आला में भी बसे हैं गिरावड़ी वाले

इंदु दहिया
वर्तमान सभ्यता की जड़ों की तलाश की यात्रा एक अत्यंत रोचक या़त्रा है। इस यात्रा में एक अजीब सा सुकून और आनंद मिलता है। 24c न्यूज प्राचीन इतिहास की अनकही कहानियों को तलाशने की यात्रा लगातार कर रहा है। इसी यात्रा के दौरान एक ऐसी जानकारी मिली, जिससे कम से कम मीडिया अब तक बेखबर था। महम चौबीसी के गांव फरमाणा खास से बेडवा के रास्ते पर लगभग मध्य में एक ऐसा स्थल है, जो इस क्षेत्र के अति प्राचीन इतिहास का आइना है। हालांकि अब तो इसके मात्र कुछ अवशेष बचे हैं। ये अवशेष भी कभी भी नष्ट हो सकते हैं।
24c न्यूज के लिए अच्छा ये रहा कि इस स्थल के पूर्णतया समाप्त होने से पूर्व इस स्थल को जानने और देखने का मौका मिल गया। आज की संडे स्टोरी में इस पुरास्थल के बारे में जानकारियां पाठकों से सांझा करने का प्रयास है। इस स्थल को गांव फरमाणा में गिरावड़ी के नाम से जाना जाता है। बाकी क्षेत्र इस स्थल से लगभग अन्जान ही है।
मात्र आधा एकड़ में बचे हैं अवशेष
गांव फरमाणा के पश्चिम में दो किलोमीटर से भी कम दूरी पर फरमाणा-बेडवा सड़क के बाई ओर लगभग आधा एकड़ का एक टिला सा दिखाई देता है। हालांकि भूमि का मालिक किसान यहां खेती करता है। लेकिन यहां पर साफ दिख रहे मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ें इस तथ्य को सपष्ट प्रमाण हैं कि कभी यहां घनी आबादी थी।

दक्ष खेड़ा के समकालीन भी हो सकता है यह खेड़ा
गांव फरमाणा और सैमाण के बीच एक पुरास्थल द़क्ष खेड़ा भी है। दक्षखेड़ा पर इतिहासकारों द्वारा उत्खनन भी किया जा चुका है। दक्ष खेड़ा हड़प्पनकालीन पुरास्थल है। दक्षखेड़ा को लगभग पांच हजार साल पहले आबाद बताया जा रहा है। फरमाणा की गिरावड़ी दक्षखेड़ा से कुछ ही दूरी पर है। फरमाणा के ग्रामीणों का कहना है कि गिरावड़ी खेड़ा की ऊंचाई वर्तमान ऊंचाई से काफी ज्यादा थी। ऐसे में जिस समय से दक्षखेड़ा पर आबादी थी। संभव है उसी समय गिरावड़ी खेड़ा पर भी आबादी रही हो। उस समय की आबादी दक्ष खेड़ा की तरह इस स्थल को छोड़ की चली गई होगी। लगभग पांच सौ पहले फिर से इस स्थल के आबाद होने के जानकारी मिलती है।

गिरावड़ी खेड़ा से आज भी दिखता है गांव फरमाणा

आज भी फरमाणा साफ दिखता है गिरावड़ी खेड़ा से
गिरावड़ी खेड़ा को लगभग उठा लिया गया है। खेत सड़क के समतल दिख रहे हैं। लगभग आधा एकड़ में ही ऊंचा भाग बचा हुआ है। इस स्थल से भी गांव अब भी साफ दिखता है। इस स्थल की ऊंचाई अब भी दस फुट से भी ज्यादा है। किसी समय इसकी ऊंचाई वर्तमान ऊंचाई से काफी ज्यादा थी।
फरमाणा से गए और फरमाणा में ही वापिस आ गए गिरावड़ी वाले
24c न्यूज के पास फरमाणा इतिहास का एक हस्तलिखित दस्तावेज है। चंद्रभान सहारण द्वारा लिखे इस दस्तावेज से पता चलता है कि एक समय फरमाणा में आबाद आशा सहारण के तीन पुत्र हुए। इनके नाम चुनिया, करणे और दंदा थे। आशा के प्रपौत्र करमा का पुत्र पांजू छोटा ही था कि करमा का देहांत हो गया। पांचू की माता अपने पुत्र को लेकर अपने पीहर चली गई और चूनिया के वशंज गिरावड़ी पर जाकर आबाद हो गए। बड़ा होने पर पांजू भी अपने चाचा के पुत्र बालका के साथ गांव फरमाणा में फिर से आकर आबाद हो गया।

ग्रामीण नरेंद्र

जिला भिवानी के गांव बागन आला में भी बसते हैं गिरावड़ी वाले
कई वर्षों बाद चुनिया के अधिकतर वशंजों ने गिरावड़ी छोड़ दी। कुछ वशंज राजस्थान के गांव पुरनालु तहसील सिवाना तथा नागौर इलाके में जा बसे। यहां आज भी काफी संख्या में सहारण परिवार हैं। इसके अतिरिक्त कुछ वशंज जिला भिवानी के गांव बागन आला में भी जा आबाद हुए। ग्रामीण नरेंद्र ने बताया कि बागन आला में यहां से गए ग्रामीणों को आज भी गिरावड़ी वाला कहा जाता है।
तीन परिवार आ गए गांव फरमाणा में
चंद्रभान सहारण के लेख से जानकारी मिलती है कि उस समय गिरावड़ी में केवल हरसुख के पुत्र चैना के पुत्र तुलसी, बेगा और सुखिया ही रह गए थे। ये तीनों भी गिरावड़ी से उठकर गांव फरमाणा मंे आ बसे। नरेंद्र साहरण ने बताया कि वर्तमान में इनके 100 के लगभग परिवार हो चुके हैं। इन्हें गिरावड़ी वाले ही कहा जाता है। गिरावड़ी वाले परिवारों की 1200 बीघे कृषि भूमि है। आरंभ में ये दासा पाना में आबाद हुए थे। नरेंद्र के अनुसार उनकी अब गांव में 22 से अधिक पीढ़ियां हो चुकी हैं।

गिरावड़ी खेड़ा पर खड़े पीपल के पेड़ की है धार्मिक मान्यता

पीपल की है मान्यता
गिरावड़ी खेड़ का टीला कई एकड़ में था। अधिकतर को उठा लिया गया है। बचे हुए खेड़े के पास एक पीपल का पेड़ भी है। इस पेड़ की धार्मिक मान्यता है। नरेंद्र सहारण ने बताया कि इस पीपल की टहनियांे को कोई नहीं तोड़ता। अगर अपने आप भी कोई टहनी टूट जाती है तो उस लकड़ी को हवन के लिए आर्य समाज मंदिर भेज दिया जाता है। उसे ग्रामीण जलाते नहीं हैं। इस पेड़ को पुराना बताया गया है।

समाजसेवी महाबीर सहारण

पुरातत्व विभाग को ध्यान देना चाहिए
समाजसेवी महाबीर सहारण का कहना है कि फरमाणा गांव हरियाणा ही नहीं बल्कि भारत के इतिहास के लिए एक अति उपयोगी गांव है। इस गांव के इतिहास से बहुत से रोचक जानकारियां मिल सकती हैं। गांव के इतिहास की ओर पुरातत्व विभाग को ध्यान देना चाहिए। इंदु दहिया/ 8053257789

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