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ग्रीष्म ऋतु (मध्य मई से मध्य जुलाई) में कैसा हो आपका आहार?-24c HEALTH MANTRA-12

गर्मी में पाचन क्रिया कमज़ोर हो जाती है, रखें अतिरिक्त सावधानी

*गर्मी के मौसम में पाचन क्षमता कमजोर हो जाती है। इसलिये खाने में गर्म, तीखे, मसालेदार, ज्यादा नमकीन, और तले हुए भोजन से दूर रहें।

*चावल, गेहूँ, जौं, ज्वार, दूध, दही, मक्खन तथा गाय के घी के सेवन से शरीर में शीतलता, स्फूर्ति और शक्ति आती है।

*सब्जियों में लौकी, कुम्हड़ा (पेठाद), परवल, पालक, नींबू, चौलाई, खीरा, ककड़ी, करेला,अरबी,भिण्डी, हरा धनिया, पुदीना और फलों में तरबूज, खरबूजा, नारियल, संतरा, मौसमीए आम, अंगुर, अनार, फालसे का सेवन लाभदायी है।

*इन दिनों कच्चे आम को भूनकर बनाया गया मीठा पन्ना, पानी में नींबू तथा मिश्री मिलाकर बनाया गया शरबत, हरे नारियल का पानी, फलों का ताजा रस, ठंडाई, जीरे की शिकंजी, दूध और चावल की खीर, गुलकंद आदि का सेवन खूब लाभदायी है। इससे सूर्य की अत्यन्त उष्ण किरणों के दुष्प्रभाव से शरीर की रक्षा होती है।

*ग्रीष्म में आने वाली दुर्बलता, रूक्षता व जलीय अंश की कमी की पूर्ति के लिए सत्तू अत्युत्तम है। जौ को भूनकर चक्की में पीसकर सत्तू बनाया जाता है ।सत्तू को शीतल जल में व मिश्री मिलाकर पीना चाहिए। केवल जल के साथ गर्म करके, भोजन के बाद, रात्रि के समय सत्तू नहीं पीना चाहिेए।

*ग्रीष्म ऋतु में अनाजों का अंकुरण भी बहुत जल्दी हो जाता हैए इसलिए अंकुरित अनाजों का सेवन करते रहना चाहिए। अंकुरित अनाज कब्ज निवारक एवं स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। चनाए मूंग, उड़द, आदि अंकुरित अनाजों को नाश्ते के रूप में ले सकते हैं। ये सुपाच्य एवं हल्के होते हैं ।

*इन दिनों में फ्रिज, कूलर का ठंडा पानी पीने से गले, दाँतों एवं आँतों पर बुरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए मटके या सुराही का पानी पियें।

*ग्रीष्म ऋतु में भी अन्य ऋतुओं की तरह निश्चित समय पर ही भोजन करना चाहिए यानी भूख सहन नहीं करना चाहिए। भूख से थोड़ी कम मात्रा में खाना चाहिए और प्रत्येक कौर 32 बार चबाना चाहिए।

*इस ऋतु में नमकीन, रूखे, बासी (घण्टे से ज्यादा बना हुआद्), तेज मिर्च.मसालेदार तथा तले हुए पदार्थ, अमचूर, आचार, इमली आदि तीखे, खट्टे, कसैले एवं कड़वे रसवाले पदार्थ न खायें। गर्मी से बचने के लिए बाजारू शीतपेय ;कोल्ड ड्रिंक्सद, आइस क्रीमए आइसफ्रूट, डिब्बाबंद फलों के रस का सेवन कदापि न करें। ये पदार्थ पित्तवर्धक होने के कारण आंतरिक गर्मी बढ़ाते हैं। रक्तस्राव, खुजली आदि चमड़ी के रोग व चिड़चिड़ेपन की बीमारी को जन्म देते हैं।

डॉ अनु लूथरा
रामगोपाल सामान्य एवं जनाना हस्पताल
महम

डॉ अनु लूथरा

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इंदु
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