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कहां से, कब आए फरमाणा में सहारण? जानिए राजा बलि के वशंज सहारणों का गौरवमयी इतिहास आज की 24c न्यूज की संडे स्टोरी में

सात सौ साल पहले फरमाणा में आए थे सहारण

बीकानेर के पास भाड़िग राज्य की स्थापना की थी सहारणों ने
हर वर्ष होते हैं राष्ट्रीय स्तर पर सहारण परिवार सम्मलेन
इंदु दहिया

उत्तर भारत में गौत्र व्यवस्था, जाति व्यवस्था से भी प्राचीन परंपरा है। हरियाणा के गांवों में तो आज भी कहावत है ’ गोती भाई और असनाई’। हरियाणा में हर गौत्र का अपना इतिहास है। अपनी परंपराएं हैं। साथ ही हर गौत्र की अपनी विशेषताएं भी हैं। कई गांव तो गौत्र विशेष के नाम से ही जाने जाते हैं।
’सहारण’ गौत्र वैसे तो हरियाणा में बहुत ज्यादा बड़ा गौत्र नहीं है, लेकिन कुछ गांवों में इस गौत्र का बाहुल्य है। महम का फरमाणा गांव ’सहारण’ गौत्र के जाटों का प्रमुख गांव माना जाता है। फरमाणा की दोनों पंचायतों और साथ लगती पंचायत बेडवा को भी मिला लें तो इसे सहारण गौत्र का हरियाणा का सबसे बड़ा गांव भी बताया जा रहा है।
राजस्थान के भादरा में आज सहारण गौत्र का सम्मलेन हो रहा है। इस सम्मेलन में सहारण प्रतिभाओं का सम्मान समारोह भी होगा। 24c न्यूज की आज की संडे स्टोरी में सहारण गौत्र के इतिहास व वर्तमान की पड़ताल के साथ-साथ फरमाणा में इस गौत्र के आगमन की पड़ताल भी कर रही है।
राजा बलि के वशंज हैं सहारण
सहारण गौत्र जिन्हें सारण भी कहा जाता है भारत के राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, गुजरात व उत्तराखंड आदि राज्यों के अतिरिक्त दुनिया के कई देशों में भी आबाद हैं।
एक मान्यता के अनुसार सहारण गौत्र को राजा बलि का वशंज माना जाता है। सहारण अर्थात सहारा देने वालों के रुप में इनकी आदि काल से पहचान रही है। एक उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार ये राजा बलि के पुत्र सहारण देव के समय में ज्यादा विख्यात हुए। यह पराक्रमी राजा इक्षु बड़िया की गद्दी पर बैठे। जो आज सहारणपुर के नाम से प्रसिद्ध है। क्षेत्रीय उच्चारण के अनुसार इन्हें ’सारण’ ’सारन’ ’सहारन’ आदि भी कहा जाता है। भांड़िग राज्य की स्थापना सहारणों ने ही की थी। विदेशी आंक्रांताओं से लड़ने में भी सहारणों का गौरवमयी इतिहास है। सहारण गौत्र के 13 थाम्बे और 16 गुण प्रख्यात बताए गए हैं।
सहारणों के बारे में
बहू-बेटी-गौ रक्षा, दिल्ली ढ़ाई दिन का राज और चमड़े के सिक्के में सोने की मेख’
किवदंती आज भी गांवों में प्रज्जलित है।

चंद्रभान सहारण (फाइल फोटो)

फरमाणा में सहारणों का आगमन
स्व. चंद्रभान के एक हस्तलिखित लेख के अनुसार गांव फरमाणा में सहारणों का आगमन सन् 1417-18 के आसपास माना जाता है। गांव में हंस नाम का सहारण राजस्थान के बीकानेर में आने वाले भाड़िंग नगर से यहां आया था। यहां पहले से रह रहे मंदेरणा गौत्र के जाटों के साथ सहारण भाई बन गया। हंस सहारण के वशंज नहेला के दो पुत्र आशा व सूरा हुए। सूरा का कल्से और कलसे का महत्ता हुआ। इसी प्रकार गांव में सहारणों की वंशावली आगे बढ़ती गई। वर्तमान स्थिति यह है कि फरमाणा खास व बादहशाहपुर दोनों ही पंचायतों में सहारण गौत्र बहुतायत में है। इसके अतिरिक्त साथ लगते गांव बेडवा में भी सहारण गौत्र के जाट काफी संख्या में आबाद हैं। फरमाणा में सर्वाधिक इसी गौत्र की है।

राजबीर

गांव के राजबीर नामक व्यक्ति के पास सहारण गौत्र की पूरी वशांवली उपलब्ध है। वह पहली पीढ़ी से अब तक पीढ़ी के बारे में जानकारी देते हैं।
होते हैं सहारण परिवार सम्मेलन
आल इंडिया सहारण परिवार (पंजीकृत) के महासचिव वीरेंद्र सिंह सहारण गांव फरमाणा के ही निवासी हैं। वीरेंद्र सिंह का कहना है कि सहारण परिवार के कई सम्मलेन हो चुके हैं। इन सम्मलेनों में देश-विदेश में बसे सहारण परिवार एकत्र होते हैं।

वीरेंद्र सिंह सहारण

सहारणों के ये गांव हैं हरियाणा में
हरियाणा में फरमाणा के अतिरिक्त सिंहपुरा, खेदड़ तथा कलायत के पास दुबल, काले खां तथा खरक पांडवा आदि सहारणों के गांव हैं। ग्रामीण प्रकाश ने बताया कि आरंभ में भाडिंग से पांच भाई चले थे। जो हरियाणा के विभिन्न भागों में आबाद हुए।
पूर्व सांसद जयप्रकाश ‘सहारण’ ही है। बिश्नोई मत में काफी संख्या में ‘सहारण’ हैं। भारत की वाॅलीवाल टीम के कप्तान रहे अमीर सिंह सहारण फरमाणा गांव के ही हैं। इसके अतिरिक्त कई अन्य हस्तियां भी हुई हैं जिन्होंने गांव फरमाणा व सहारणों को देश दुनिया में गौरवान्वित किया है।
समाजसेवी महाबीर सहारण का कहना है कि उन्हें गर्व है कि वे सहारण परिवार में जन्में हैं। इस परिवार की आदिकाल से ही प्रेम, भाईचारे, समाज व राष्ट्र सेवा तथा सबको साथ लेकर चलने की महान परंपरा रही है। नई पीढ़ी पर इस परपंरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है।

महाबीर सहारण

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