Home ब्रेकिंग न्यूज़ नाम से पुकारो आएंगी, डराओगे मारेंगी, कौन? पढ़िए सन्डे स्पेशल 24c

नाम से पुकारो आएंगी, डराओगे मारेंगी, कौन? पढ़िए सन्डे स्पेशल 24c

राजस्थानी गायों और गौपालकों पर 24c न्यूज की विशेष रिपोर्ट

सब गायों के नाम हैं, नाम से ही पुकारते हैं
गौपालक खुद भूखें रह सकते हैं, गाय नहीं
अपना तथा गौपालक का खर्चा खुद ही निकालती हैं गाय

पायल, गोमती, पारीव, गोदावरी, गंगाड़ी, जेलो, सवोर, माताड़ी, मादड़ी। आपको लगा होगा कि ये किन्हीं महिलाओं के राजस्थानी नाम होंगे। नाम तो राजस्थानी हैं, लेकिन महिलाओं के नहीं गायों के हैं। ऐसे ही और भी सैंकड़ों नाम हैं।
इन नामों को सुनकर गाय तुरंत आ जाती हैं। अपने गौपालक की आज्ञा का आज्ञाकारी बच्चों की तरह पालन करती हैं। तभी तो सैंकड़ों गायों के समूह पर बस एक ही गौपालक काफी है। वो भी आगे चलता है। 24c न्यूज संडे स्टोरी में आज आपकों राजस्थानी गायों और गौपालकों के कुछ अद्भुत अनछूए तथ्यों से अवगत करवा रहा है।
इन गायों और गौपालकों का डेरा मिला गांव फरमाणा में बैंसी मार्ग पर सरकारी स्कूल परिसर तथा इसके आसपास। इन लंबें और भारी सींगों वाली गायों के समूहों को अक्सर आपने सड़कों पर कतारों में देखा होगा। ये गौपालक पीढ़ियों से यही काम कर रहे हैं और यही करने की इच्छा भी है।

सुख दुख में साथ बैठते हैं गौपालक


चिरवी, दाना, न्याणाराम बाहर गायों के समूहों के साथ थे। जबकि मंगला, रूंपा, भावा, पूणा तथा राणा आदि डेरे के एक ठिकाने पर थेे। कुछ दिन पहले इस ठिकाने के परिवार की बच्ची की अकाल मृत्यु हो गई थी। इस परिवार को सांत्वना देने के लिए कुछ बड़े बुजुर्ग इस परिवार के साथ बैठे थे। बच्चे भरत, जीतू, मुकेश आदि यहां-वहां खेल रहे थे। ये गौपालक एक दूसरे के साथ मिलकर गायों के समूह बना लिए जाते हैं। पाली अर्थात देखभाल करने वाले को अतिरिक्त पैसा भी मिलता है। इस डेरे के सभी गौपालक जोधपुर और जालौर जिले के गांवों के हैं। एक डेेरे में 16 परिवारों के ठिकाने हैं। एक समूह में एक सौ तक गाय होती हैं। एक साथ दस से 15 समूह यात्रा करते हैं। कम से कम आठ महीनें अपने गांव से बाहर रहते हैं। बारिश ना हो तो पूरा-पूरा साल भी बाहर रहना पड़ता है।

डेरे में पानी लेकर आती महिलाएं


राजपूतों के साथ रहा है संबंध
इन गौपालकों का संबंध राजपूतों से बताया गया है। कहते हैं राजपूतों के साथ ही चलते थे। युद्ध के लिए जाने वाले सैनिकों के लश्कर के साथ गाय भी होती थी। उनकी देखभाल तथा अन्य काम ये संभालते थे। अपने आप को ‘रेबारी’ कहते हैं। कदचित ‘रहबरी’ से मिलता जुलता नाम दिखता है। संभव है कि ये लश्कर के आगे चलते हों।

नाम से बुलाओ तो ऐसे आ जाती हैं गाय


बहुत समझदार होती हैं गाय
ये गाय बहुत ही समझदार होती हैं। गौपालक इनकों इनके नाम से पुकारते हैं। अपनी बारी से आकर अपना चारा-खाना ले लेती हैं। गौपालक की आवाज और इशारों को किसी समझदार इंसान की तरह समझती हैं।
गौपालक पर हमला सहन नहीं करती
गाय अपने पालक पर किसी भी प्रकार का हमला सहन नहीं कर सकती। इन्हें अगर लगे कि कोई इनके पालक को हानि पहुंचाने का प्रयास कर रहा है तो ये तुरंत उस पर हमला कर सकती हैं। विशेषकर रात के समय बहुत सावधान रहना पड़ता है।

ऐसे बना लेते हैं अपना अस्थायी डेरा


सारे खर्च निकलती है गाय ही
गौपालको का कहना है कि अपना तथा पालकों के परिवार का खर्च गाय ही निकालती है। इनके गौपालकों की जरुरतें ज्यादा नहीं हैं। उनके दूध से चारा-पानी सब आ जाता है। एक समूह से लगभग एक क्विंटल दूध प्रतिदिन हो जाता है। जिसे डेयरी वाले ले जाते हैं। गोपालकों का भी नियम है, वे खुद भूखे रह सकते हैं, गाय को भूखा नहीं रख सकते।

एक साथ दो बर्तन उठाकर लाती हैं सिर पर

बच्चों की पढ़ाई की चिंता है
गांव में ना रहने के कारण अक्सर इनके बच्चे अनपढ़ रह जाते हैं। हालांकि इसका इन्हें मलाल तो है, लेकिन गौपालन ये किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहते। ये जरुर प्रार्थना करते हैं कि जहां इनका डेरा हो वहां इनके बच्चों की कुछ पढ़ाई हो जाए तो अच्छा है।

ठिकाना बनाने के लिए मिट्टी खोदती महिला


साफ सुथरे हैं डेरे
जहां कुछ दिन रहते हैं, वहीं डेरा लगा लेते हैं। इन गौपालकों के डेरे बहुत ही साफ सुथरे होते हैं। महिलाएं दिनभर डेरों पर ही काम करती हैं। घरेलू कामों के अतिरिक्त गायों के लिए जरुरतानुसार चूरी आदि तैयार करती हैं। बच्चे भी इन कामों में हाथ बटाते हैं। हजारों किलोमीटर दूर घूमने के बावजूद ये अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ जीते हैं।

फोटो सुनील खान

गौपालकों द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित

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