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दिल्ली से पेशावर के रास्ते में महम का ‘पड़ाव’ था प्रमुख ‘24c संडे स्पेशल’

मुगलकाल से ब्रिटिश काल तक सेना डालती थी पड़ाव

  • हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों से सुसज्जित होती थी सेना
  • महम के पड़ाव को हॉल में ही सेना ने फिर लिया है कब्जे में
  • पड़ाव की विशेष पड़ताल केवल 24सी न्यूज पर ‘संडे स्टोरी’ में

महम के पड़ाव के हॉल में ही सेना ने फिर से अपने कब्जे में लिया है। अब लगभग 36 एकड़ भूमि पर ही सेना अपना दावा कर रही है। किसी समय यह भूमि इससे ज्यादा रही होगी। शहर के पश्चिम उत्तर में स्थित इस भूमि को आज भी पड़ाव के नाम से जी जाना जाता है। 24c न्यूज की आज की संडे स्टोरी महम के ‘पड़ाव’ की पड़ताल ही है।

इस भूमि के लगभग बीचों बीच अब बाईपास भी निकल चुका है। इसी भूमि से पुराना नेशनल हाईवे दस भी गुजरता है। तथ्य और सत्य तो और भी बहुत हैं, लेकिन आज हम यहां केवल कुछ ही तथ्यों का जिक्र कर रहे हैं, जो नई पीढ़ी के लिए जानना जरुरी हैं।

क्या होता था पड़ाव

पड़ाव दरअसल एक ऐसा स्थान होता था जहां सेनाएं आते-जाते डेरा डालती थी। लंबी यात्रा के दौरान सेनाओं का विश्राम स्थल पड़ाव होता था। यह भूमि 50 एकड़ के आसपास या उससे भी ज्यादा होती थी। सेना एक से ज्यादा दिन तक भी पड़ावों में रुक जाती थी।

‘मुरंड’ और ‘बावड़ी’ से क्या है पड़ाव का संबंध

पड़ाव के लिए यह आवश्यक था कि आसपास दुश्मन का इलाका ना हो। इलाका सुरक्षित हो। जरुरत की वस्तुए भी उपलब्ध हों। पड़ाव के साथ ही महम का ऐतिहासिक मुरंड तालाब था। यह तालाब शहर के पशुओं के साथ-साथ जरुरत पड़ने पर सेना के काम भी आता था।

महम की बावड़ी भी यहां से ज्यादा दूर नहीं है। बावड़ी के मुख्य कुएं तक सीढ़ियां जाती थी। घोड़ों से पानी लाया जा सकता था। सेना के लिए बावड़ी का पानी लाकर पीने के प्रयोग में लाया जा सकता था। इस बीच जलभरत तालाब भी था। यह तालाब का पानी भी पीने के लिए प्रयोग किया जाता था।

सेना ने महम के पड़ाव से गिरा दिए अवैध निर्माण

चरागाह भी होती थी

पड़ाव के पास चरागाह भी होती थी। ताकि सेना के पशुओं को चारा मिल सके। महम में भी यह चरागाह थी। ऐसा माना जाता है कि चारागाह पर ही किसानों ने कब्जे किए हुए थे। बाकी हाथी घोड़े रुकने की खाली जगह पर पशु मेला लगता था।

सेना का दावा क्यों है

वक्त कोई भी रहा हो, सेना तो राजा के आधीन ही होती हैं। मुगलकाल के राजाओं की सेना बाद में अंग्रेजों के पास आ गई। देश आजाद हुआ तो यही सेना भारतीय हो गई। पड़ाव तो उस दिन भी सेना का था और बाद में भी सेना का हो गया। रक्षामंत्रालय ने पड़ावों की भूमि को कब्जे में लिया। जहां संभव हो सका कब्जे छुड़वाएं गए। बहुत से ऐसे पड़ाव है जो इतिहास बन चुके हैं। अच्छी बात है महम के पड़ाव का अस्तित्व बचा है।

सेना ने ले लिया महम के पड़ाव का कब्जा

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