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‘समुन्द्र’ की ‘भजनमाला’ में हैं भक्ति के मोती

बलम्भा के रचनाकार की नई रचना

  • मिट्टी से जुड़े कलमकार हैं- समुन्द्र सिंह पंवार

कहते हैं कि जब एक कलमकार कलम थामता है तो वह निजी कार्य नहीं कर रहा होता। वह देश और युग के कल्याण में एक पवित्र आहुति डाल रहा होता है। उसके गढ़े शब्दों के निशान आने वाली पीढ़ी को एक नेक डगर का पता बताते हैं।

महम चौबीसी के गांव बलम्भा की रज में पले बढ़े समुन्द्र सिंह पंवार ऐसे ही एक सृजनशील लेखक हैं।

दूसरी पुस्तक है ‘भजन माला’

समुन्द्र सिंह काव्य – कोष ” की पसंद किए जाने के बाद ” भजन – माला ” समुन्द्र सिंह की दूसरी पुस्तक है। यह पुस्तक धार्मिक आस्था व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का आईना कही जा सकती है | इस पुस्तक का शुभारंभ श्री गणेश जी की वंदना से किया गया है :-

रिद्धि – सिद्धि के तुम दाता
पार्वती है तेरी माता
पिता तेरे महेश जी …

कवि ने भक्ति – रस में श्रृंगार रस का प्रयोग भी किया है :-

‘माथै चन्द्रमा साज रहा, गल सर्पों की माला हो।’

उपरोक्त पंक्तियों में भगवान शिव के अलौकिक रूप का बहुत ही मनोहारी चित्रण है|

समुन्द्र सिंह जी ने कई जगह इतिहास को भी दर्शाया है :-

‘विक्रमादित्य चोर बणाया।
तेली घर कोल्हू चलवाया।।’

एक जगह ये सबक भी दे रहे हैं :-

‘नल का राज जुए में जिताया।’ अर्थात बुरे कर्मों का फल भी बुरा ही मिला करता है|

कवि महोदय ने प्रसूता श्रृंगार व बांझ स्त्री की पीड़ा का भी बखूबी वर्णन किया है :-

‘जच्चा बण कै गूंद – पंजीरी मनै कोन्या खाई हो।
आज तलक ना देखी मनै घाल छठी की स्याही हो।’

भक्ति – भाव की बात और गऊ माता का जिक्र ना हो यह असंभव है। कवि ने इस नियम का भी पालन किया है:-

‘उसका रक्षक बणे विधाता।
जिसके घर मै हो गऊ माता।।’

इसी प्रकार माँ की महिमा का कवि ने वर्णन करते हुए लिखा है :-

‘ना माँ से बढ़के जग में कोई।
सेवा कर दिल से जगे किस्मत सोई।’

चूंकि कवि भी एक सामाजिक प्राणी है | उसने एक बहन की तड़प को बड़े ही विरले अंदाज में पेश किया है :-

‘साची कहरी मैं घणी दुःख पाई।
हो बाबा हो दे मनै एक भाई।’

कवि – महोदय खुद एक किसान हैं वे किसान की तकलीफों को भली – भांति जानते हैं | एक भजन में किसान की दुर्दशा का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया है :-

‘दिन – रात मेहनत करता ।
फेर भी भूखा – नँगा फिरता।’
ना रहण नै महल मकान,
ओ भोले देख आकै।

समुन्द्र सिंह की लेखनी की ख़ास बात ये है कि ये आम बोलचाल की भाषा में बहुत गहरी बात कह देते हैं। इस पुस्तक में कवि ने लोकोक्ति , मुहावरों और अलंकारों का अच्छा – खासा प्रयोग किया है | पुनरुक्ति अलंकार की एक झलक देखिए :-

‘लाल – लाल फल यो तै खावै।
लाल तिलक यो माथै लगावै।’

अनुप्रास अलंकार की छटा देखिए :-

‘हे सुर्य – सूत शनिराज , तुम सबसे शक्तिशाली हो।’

समुन्द्र सिंह जी की इस भजन- माला पुस्तक का विमोचन हरियाणा कला परिषद रोहतक के प्रांगण में वरिष्ठ साहित्यकार एवं आकाशवाणी के पूर्व निदेशक रामफल चहल तथा परिषद के निदेशक एवं ओ एस डी बॉलीवुड सिंगर गजेंद्र फौगाट की मौजूदगी में किया गया।

‘सैंडिल’ फेम गीतकार है

समुन्द्र सिंह सैंडल गीत के माध्यम से वे उतर भारत की हर गली को नाप चुके हैं। यह गीत काफी पसंद किया गया है।

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